रविवार, 3 फ़रवरी 2013

खामोश है ज़ुबाँ, आज कुछ आँख भी नम है


खामोश है ज़ुबाँ, आज कुछ आँख भी नम है,
ना मिला कोई अपना, बस यही एक गम है

जख़्मो को बना रहा है क्यो हमदर्द अपना
कब सुनी है दिल की, जमाना तो बेरहम है

पूछते है लोग, क्यो नही मिला दिलदार कभी
परवाह है कुछ जमाने की, कुछ आरज़ू बेदम है

"अखिल", लंबा है सफ़र, और काटें भी बहुत है
बना किसी को अपना, चाहने वाले क्या कम है

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

कुछ छुपा था दिल मे, आखों ने जता दिया हमे


जिंदगी तेरी उलझनो ने कितना सुलझा दिया हमे,
ना हमेशा दुख हैं, ना सुख कभी, बता दिया हमे

खामोश लब यूँ ना थे हमारे, यूँ तुम्हारे सामने
कुछ छुपा था दिल मे, आखों ने जता दिया हमे

मैं ही था, जो ग़ज़ल लिखता रहा, हर फ़लसफ़े पे
कभी दी अधरो पर मुस्कान, कभी सता दिया हमे

दर-बदर भटकता रहा, खुशी की तलाश मे "अखिल"
कौन है वो अपना, जिसने तेरा पता दिया हमे
                                - अखिलेश गुप्ता