बुधवार, 29 दिसंबर 2010

कभी किसी को यादों से मिटाकर देखिए


कभी किसी से नज़र मिलाकर देखिए,
हो सके तो एक दोस्त बनाकर देखिए

रुक जाएगा ज़िंदगी का कलम चलते चलते
कभी कोई खूबसूरत ग़ज़ल बनाकर देखिए

महफ़िलो मे तो लोग हँस ही लेते हैं
तन्हाई मे भी कभी मुस्कुराकर देखिए

अजीब सा सुकून है शब्दो के भंवर मे
अहसासो को पन्नो पे सजाकर  देखिए

रिश्तों को तोड़ना तो आसान है "अखिल"
कभी किसी को यादों से मिटाकर देखिए

4 टिप्पणियाँ:

वन्दना ने कहा…

बहुत ही सुन्दर भाव संयोजन।

'साहिल' ने कहा…

खूबसूरत अशआरों से सजी ग़ज़ल, keep writing

Raj ने कहा…

Lazawab Gazal hai.

"Kabhi kisi ko yaadon se mita ke dekhiye"

बेनामी ने कहा…

kya bat he dear puri hydrology cycle bana diye,,,,,,,,,,,,,......